Tuesday, November 8, 2016

काले धन पर पी एम मोदी की "सर्जिकल स्ट्राइक"

500 और 1000 के नोटों का विमुद्रीकरण करते हुये पी एम मोदी ने अपनी सरकार का अब तक का सबसे अधिक साहसी कदम उठाते हुये  काले धन के खिलाफ एक ऐसा प्रहार किया है, जिसके वार से जहाँ एक ओर ईमानदारी से पैसा कमाने वाली जनता खुशी से फूली नही समा रही है,वहीं उन लोगों के चेहरे पर मातम छाया हुआ है, जिन्होने जनता को लूट लूट कर काले धन को अपनी तिजोरियों मे इकट्ठा किया हुआ था. काले धन के खिलाफ छेड़े गये इस युद्ध की मार किस पर सबसे ज्यादा पड़ी है, आइए उन लोगों के बारे मे विचार करते हैं :

1. पाकिस्तान की सरकार खुद 500 रुपये और 1000 रुपये के नकली नोट छाप-छापकर उन्हे आतंकवादियों के मार्फत हमारे देश मे भेज रही थी और पाकिस्तान का सारा का सारा आतंकवादी तामझाम इन्ही नकली नोटों के गोरखधंदे पर चल रहा था. पाकिस्तान सरकार को और उसकी आतंकवादी गतिविधियों को इससे बहुत बड़ा झटका लगा है.

2. जिन राजनेताओं ने पिछले 70 सालों मे जनता को लूट लूटकर प्रचुर मात्रा मे काला धन इकट्ठा किया हुआ था, उनकी हालत सिर्फ देखने लायक है- जिन लोगों ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की "सर्जिकल स्ट्राइक" पर भी सवाल उठा दिये थे, फिलहाल तो वे लोग भी इस बार् की "सर्जिकल स्ट्राइक" पर चुप्पी साधे हुये है और अभी तक कोई बहुत बड़ा हो-हल्ला नही किया है.

3. सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों ने भी पिछले 60-70 सालों मे काफी मात्रा मे जनता को प्रताडित कर करके रिश्वत के माध्यम से काला धन इकट्ठा किया हुआ था, यह सब लोग भी रातों-रात सड़क पर आ गये हैं और अपने दुष्कर्मों का जीते जी फल भुगतने के लिये तैयार हो रहे हैं.

4. काले धन पर की गयी सर्जिकल स्ट्राइक की मार उन व्यापारियों पर भी पड़ी है, जिनका धंधा ही काले धन पर टिका हुआ था. मुम्बई स्टॉक एक्सचेंज का संवेदी सूचकांक आज लगभग 1600 अंक नीचे खुला, यह इस बात का जीता जागता प्रमाण है कि काले धन का हमारी अर्थव्यवस्था पर कितना गहरा प्रभाव है. जिन व्यापारियों और उद्योगपतियों ने काले धन को इकट्ठा किया हुआ था, निश्चित रूप से , उन सब के लिये भी यह संकट की घड़ी है.

आम आदमी और मध्यम वर्ग जो अब तक काले धन की कमाई करने वालों से त्रस्त रहता था, उसे सबसे अधिक खुशी हुई है क्योंकि आज जाकर उसे यह मालूम पड़ा है कि ईमानदारी से धन कमाने का सुख क्या होता है. ऐसा भी नही है कि यह सब कुछ अचानक हो गया है. जब 30 सितंबर 2016 को काले धन को घोषित करने की स्कीम बंद हुई थी, उसके तुरंत बाद सरकार की तरफ से यह वक्तव्य आया था कि जिन लोगों ने अपना काला धन इस स्कीम मे भी घोषित नही किया है, आने वाले दिनो मे उन्हे चैन से सोने नही दिया जायेगा. कल 8 नवंबर 2016 की रात तो काफी ऐसे लोग नही सो पाये होंगे. आगे और कितनी रातें इनकी बिना सोये कटेंगी, यह देखने वाली बात है.

क्या मोदी टिक पायेंगे केजरीवाल के सामने ?

भ्रष्टाचार को खत्म करने की नीयत से राजनीति मे आये और दुनिया के सबसे भ्रष्ट राजनीतिक दल के साथ दिल्ली मे गठबंधन सरकार चला रहे केजरीवाल जी को लोकसभा चुनावों मे जाने की इस कदर हड़बड़ी मची हुई है कि वह सही और गलत का फर्क ही नही कर पा रहे हैं. अब तो उनकी चौकड़ी इतनी शातिर हो चुकी है कि उन्होने जनता से एस एम एस करके राय लेना भी बंद कर दिया है.

आम आदमी पार्टी का आत्मविश्वाश केजरीवाल जी को प्रधान मंत्री बनाने को लेकर किस हद तक बढ़ा हुआ है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि यह पार्टी दूसरी राजनीतिक पार्टियों से अपने आपको कई मायनों मे अलग दिखाने की नाकाम कोशिश कर रही है. दिल्ली विधान सभा के चुनाव नतीजे 8 दिसंबर को घोषित हुये थे जिसमे 28 विधायक आम आदमी पार्टी के भी चुने गये थे-दल बदल कानून के हिसाब से अगर 28 के एक तिहाई विधायक यानी कि 10 विधायक अपने आप को अलग करके किसी दूसरी पार्टी को समर्थन दे देते है तो उनकी विधान सभा की सदस्यता भी बनी रहेगी और आम आदमी पार्टी का कानूनी तरीके से विभाजन भी हो जायेगा.

आम आदमी पार्टी के नेताओं के पस कुछ ऐसी दिव्य शक्ति भी मौजूद है जो उन्हे 8 दिसंबर के पहले ही इस बात का आभास करा देती है कि 8 दिसंबर को नतीजे आयेंगे उसमे उनकी पार्टी को कम ना ज्यादा बिल्कुल 28 सीटें मिलेंगी- इसीलिये उनके विधायक मदन लाल को 7 दिसंबर की रात को ही "विदेश मे बैठे भाजपा के शीर्ष नेताओं"का फोन भी आ जाता है कि मदन लाल जी आप खुद को मिलाकर 10 विधायक लेकर अपनी पार्टी से अलग हो जाओ और भाजपा की सरकार बनबा डालो.

भाजपा मे हालांकि राजनीति के जानकiर तो कई नेता हैं लेकिन इस तरह की दिव्य शक्ति( जो आने वाले चुनाव नतीजों का एकदम सही पूर्वाभास करा सके) से युक्त तो एक भी नेता नही है. मोदी जी तो हर्गिज़ भी यह काम नही कर पायेंगे- लिहाज़ा जहां तक प्रधान मंत्री की कुर्सी की दौड़ का सवाल है, वह यहाँ केजरीवाल जी से पिछड़ते दिखाई दे रहे हैं.

चलिये अब दिव्य शक्तियों के अलावा और योग्यताओं की भी बात कर लेते हैं- हो सकता है यहाँ मोदी जी हाथ मार ले जाएं. लेकिन हमे यहाँ भी निराशा ही हाथ लगी है- दरअसल हमारे केजरीवाल जी तो भारतीय राजस्व सेवा से आये अधिकारी हैं और मोदी जी का बॅकग्राउंड चाय बेचने का रहा है- तो मोदी जी यहाँ भी मात् खा गये. आखिर मोदी जी क्या सोचकर पी एम की दौड़ मे शामिल हुये है ? उन्हे शायद केजरीवाल जी और उनकी पार्टी की दिव्य शक्तियों का अंदाज़ा नही है. क्या खाकर मोदी जी केजरीवाल जी के आगे टिक पायेंगे ?
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rajeevg@hotmail.com
Published on 6/2/2014

बहुत मंहगी पड़ेगी ये "मोदी ब्रांड" चाय !

जी हाँ यहाँ किसी पांच सितारा होटल मे 100-200 रुपये मे एक कप मिलने वाली घटिया चाय की बात नही हो रही है. यहाँ उस चाय की बात हो रही है जिसके सपा नेता नरेश अगरवाल से लेकर कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर तक दीवाने हैं और उस चाय का एक घूँट पीने के लिये ये दोनो नेता और इनकी पार्टियाँ युगों युगों से तरस रही हैं.

कांग्रेस के प्रमुख सहयोगी राजनीतिक दल और उत्तर प्रदेश मे गुंडा राज की स्थापना करने वाली पार्टी सपा के नेता जब यह बोले कि मोदी तो चiय बेचने वाले हैं और वह क्या खाकर पी एम बनेंगे, तो किसी को बहुत ज्यादा हैरानी नही हुई- दरअसल उत्तर प्रदेश को पूरी तरह से जंगल राज मे तब्दील कर चुके सपा के नेताजी की योजना यह थी कि धीरे धीरे इस गुंडा राज और जंगल राज की स्थापना  प़ूरे   भारत मे की जाये क्योंकि सभी देशवासियों का यह पूरा अधिकार है कि उन्हे भी इस अभूतपूर्व गुन्डाराज और जंगलराज का आनन्द मिले-यह आनन्द सिर्फ उत्तर प्रदेश के लोगों की बपौती थोड़े ही है-लेकिन सपा के मनसूबों पर तब पानी फिरने लगा जब सब तरफ से यह चुनाव सर्वे आने लगे कि मोदी जी उत्तर प्रदेश मे भी जंगल और गुंडा राज को समाप्त करने का मन बना चुके है और अभूतपूर्व बहुमत के साथ जीत हासिल करने वाले हैं.

नरेश अगरवाल ने ऐसे तो खिसियाहट मे मोदी को लताड़ने की नीयत से यह बयानबाज़ी की थी लेकिन जब कांग्रेस पार्टी मे बैठे उनके आकाओं को लगा कि मोदी पर उनकी इस लानत मलानत का कोई असर नही पड रहा है और उल्टा मोदी तो इस बयानबाज़ी के बाद और भी अधिक आक्रामक होकर उत्तर प्रदेश की तरफ अपना विजय रथ लेकर बढते जा रहे हैं तो कांग्रेस ने इस काम का जिम्मा अपने ऊपर ही ले लिया और अपने एक वरिष्ठ नेता श्री मणिशंकर अय्यर को इस काम को अंज़ाम देने की जिम्मेदारी सौंपी.

अय्यर भी कोई कच्चे खिलाड़ी तो हैं नही जो इस बात को मामूली तरीके से अंज़ाम देते-उन्होने उस समय बयानबाज़ी की जब उनकी पार्टी का अखिल भारतीय स्तर का जलसा चल रहा था और सारे मीडिया कैमरों की निगाहे उनकी तरफ ही थीं- अय्यर साहब ने आव देखा ना ताव-कह दिया  कि मोदी अगर चाहें तो हम उनके लिये चाय बांटने की व्यवस्था यहाँ पर करवा सकते हैं-दरअसल अय्यर साहब वह काम करना  चाह रहे थे जो उनके चहेते नरेश अग्रवाल नही कर सके थे-यानी कि अपनी खिसियाहट को छिपाने के लिये मोदी को लताड़ने का काम.

अय्यर साहब को लगा होगा कि उनके इस साहसिक कार्य के लिये उनकी पार्टी का आलाकमान बहुत खुश होगा और क्या पता जैसे मनमोहन सिंह की लॉटरी निकल आई, कभी उनके भी अच्छे दिन आ जाएं.

लेकिन हाय इन नेताओं का दुर्भाग्य, मोदी जी ने पलटकर जब इन लोगों को चाय पिलाने की ठान ली और जगह जगह् चाय बांटने और बंटवाने का काम शुरु करवा दिया तो इन लोगो को यकायक लगा कि यह चाय तो इन नेताओ और उनकी पार्टियों के लिये बहुत मंहगी पड़ने वाली है. खबर यह भी है कि जितने भी मोदी विरोधी गद्दार हैं, उन लोगों ने अपने लिये चाय बेचने के लिये खोके वगैरा की जगह का बन्दोबस्त करना शुरु कर दिया है ताकि 2014 के चुनावों के बाद कम से कम चाय बेचकर तो अपना बाकी का जीवन यापन कर सकें.
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rajeevg@hotmail.com
Published on 10/2/2014

तीसरे मोर्चे की अंतिम यात्रा निकलेगी इस बार ?

हिन्दी मे एक बड़ी ही मशहूर कहावत है-धोबी का कुत्ता, न घर का ना घाट का ! हमारे बड़े बुजुर्गों ने पता नही क्या सोचकर यह कहावत बनाई होगी लेकिन उन्हे क्या मालूम था कि उनकी बनाई हुई यह कहावत आज की तथाकथित राजनीति मे समय समय पर बनने वाले "थर्ड फ्रंट " यानि कि तीसरे मोर्चे पर बखूबी लागू हो जायेगी !

पहले तो यह समझने की कोशिश करते हैं कि यह तीसरा मोर्चा है किस चिड़िया का नाम ? दरअसल कुछ ऐसे नेता और राजनीतिक दल हमारी व्यवस्था मे अपने आप पैदा हो गये हैं जिनका मुख्य कार्य ही देश, समाज और सरकार के अंदर "अव्यवस्था" पैदा करना है ! यह वे लोग हैं जो गलती से किसी तरह जीत कर विधान सभा या संसद मे पहुंच तो जाते हैं लेकिन उसके बाद क्या करें, उसका पता ना तो इन्हे होता है और ना ही उस जनता को जो इनको चुनकर भेजती है.

ये वह राजनीतिक दल या नेता होते हैं जो चुनावों से पहले तो जनता से यही कहते रहते हैं कि हम किसी भी दूसरे दल के साथ किसी भी तरह का कोई गठबंधन नही करेंगे और सभी 545 सीटों पर चुनाव लडकर किसी ना किसी तरह प्रधान मंत्री बन जायेंगे, लेकिन जैसे जैसे चुनावों का समय नज़दीक आता है और इन्हे कोई राष्‍ट्रीय स्तर की राजनीतिक पार्टी अपने मुंह नही लगाती है तो यह अपनी ही खिचडी पकानी शुरु कर देते है और उस खिचडी को यह लोग कभी कभी खुद और कभी कभी मीडिया वाले बड़े चाव से " तीसरा मोर्चा " या फिर अंग्रेज़ी मे थर्ड फ्रंट कहकर संबोधित करते हैं.

चुनाव जीतने के शुरु के चार सालों मे तो यह लोग किसी ऐसी राजनीतिक पार्टी को अपना शिकार बनाने की कोशिश करते है जिसके पास सरकार बनाने के लिये कुछ सदस्यों की सँख्या कम पड रही होती है और अपना "समर्थन" देकर उस पार्टी की सरकार बनबा कर यह अपने आपको धन्य महसूस करते हैं-बदले मे इन्हे क्या मिलता है ? इन्हे एक तो "कांग्रेस बचाओ इन्वेस्टिगेशन" यानि की सी बी आई की तरफ से अभयदान की प्राप्ति हो जाती है और इनके एक आध नेता को भ्रष्टाचार करने के लाइसेंस के साथ मंत्री बना दिया जाता है-इस तरीके से इन लोगों की दुकानदारी बिना किसी खास परेशानी के पिछले कई दशकों से चल रही है

पाँचवे साल मे यह लोग अगले लोकसभा चुनावो की रणनीति बनाने मे लग जाते है और जिस सरकार के साथ चार साल गुजार दिये उसे भी मौका देखकर कोसना शुरु कर देते है.

तीसरे मोर्चे के नाम पर जो नरपिशाची ताकतें समय समय पर इकट्ठा होने की नौटंकी करती हैं, उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वे उत्तर प्रदेश,बिहार और पश्चिम बंगाल सहित देश के कई राज्यों मे गुन्डाराज और जंगल राज्य की स्थापना करने मे कामयाब रही हैं.

सवाल यह है कि इस बार यानि कि 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले ये लोग काफी घबराये और बौखलाये हुये क्यों हैं ? उसका प्रमुख कारण यही समझ मे आ रहा है कि इस बार इनको लग रहा है कि मोदी के नेत्रत्व मे भाजपा की सरकार बननी लगभग तय है और क्योंकि वह सरकार पूर्ण बहुमत के साथ बनेगी तो इन लोगों का कोई "नामलेवा" और "पानीदेवा" नही होगा. साथ ही इन लोगों ने जो दुष्कर्म आज तक किये है उनके चलते पहले तो जनता इनकी जमानत जब्त कराकर दंडित करेगी- इस दंड को तो ये बेचारे किसी तरह झेल भी जाते लेकिन दुष्कर्मों का कानूनी दंड जो मोदी के द्वारा इन लोगों को दिया जायेगा, बह इन लोगों को दिन रात आतंकित किये जा रहा है !

इस तीसरे मोर्चे के नेताओं की बौखलाहट का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहले तो यह लोग अपने राज्य मे साम्प्रदायिक दंगों का आयोजन करते है और जब लगता है कि पोल खुल खुलकर जनता के सामने आ रही है तो अपना गम गलत करने के लिये नाच गाने का रंगरेलियों युक्त कार्यक्रम का भी फटाफट आयोजित कर डालते हैं.
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rajeevg@hotmail.com
 Published on 14/2/2014

केजरीवाल को पी एम बनने से कोई नही रोक सकता !

दिल्ली के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के  अभूतपूर्व  नेता अरविन्द केजरीवाल जी को पिछले कुछ दिनो से इस बात का खूब शौक चर्राया हुआ है कि वह बिना मांगे ही लोगों को ईमानदारी और बेईमानी का प्रमाण पत्र दे देकर खुद को धन्य समझ रहे हैं-मीडिया ने भी एकता कपूर के सास बहू के धारावाहिकों को छोड़कर इस चटपटी नौटंकी पर अपना सारा ध्यान केन्द्रित करने मे ही अपनी भलाई समझ ली है.

खबर तो यह भी आ रही है की खुद एकता कपूर ने अपनी बदहाली से परेशान होकर यह फैसला किया है कि अब वह सिर्फ एक ही सीरियल पर अपना ध्यान केन्द्रित करके मनचाहा पैसा कमाएँगी. सीरियल का नाम होगा-"केजरीवाल को पी एम बनने से कोई नही रोक सकता." यह धारावाहिक लोगों को तब तक झेलना पड़ेगा जब तक केजरीवाल जी का पी एम के रूप मे राज्याभिषेक नही हो जाता. इशारा सॉफ है कि या तो केजरीवाल को पी एम बनाओ या फिर 24 घंटे हर चैनल पर यह सीरियल देखो-इस सीरियल को बनाने मे कलाकारों का खर्चा कोई नही आयेगा-यह भी एक बहुत बड़ी बचत होगी,क्योंकि कलाकारों की तो केजरीवाल साहब के पास कोई कमी नही है. सर्वगुण संपन्न और अनोखी प्रतिभा से युक्त ये कलाकार  चारों पहर इतनी रोचक बयानबाजी करते रहते है कि कैमरे उनका पीछा ही नही छोड़ते.

 केजरीवाल जी भी अपनी तरफ से हालांकि पूरी कोशिश कर रहे हैं कि सास बहू के सीरियल बनाने वालों को उनकी वज़ह से जो नुकसान हुआ है, उसकी किसी तरह से भरपाई अपनी जान देकर भी करवा दें-एक निष्ठावान और ईमानदार नेता की यही तो सबसे बड़ी पहचान है कि वह किसी का नुकसान होते नही देख सकता. अब देखो दिल्ली के ऑटो वालों को पुलिस परेशान करके उन्हे नुकसान पहुँचा रही थी तो केजरीवाल जी ने ऐसी व्यवस्था कर दी कि अब पुलिस दिल्ली के ऑटो वालों का बॉल भी बांका नही कर सकती चाहे ये ऑटो वाले दिल्ली की जनता के साथ जितनी मर्ज़ी   बदसलूकी और गुंडागर्दी करे- ईमानदारी का तकाज़ा तो यही कहता है कि जिन ऑटो वालों ने आड़े वक्त पर केजरीवाल जी का मुफ्त का प्रचार करके उनका साथ दिया, उनकी सहायता हर हालत मे की जाये-जनता जहां कांग्रेस के कुशासन को 15 साल झेल गयी, क्या 49 दिनो के कुशासन को याद रख पायेगी ?

कहानी को रोचक और सस्पेन्स से भरपूर बनाने मे तो खुद केजरीवाल जी बहुत माहिर हैं-तभी तो वह मोदी पर आरोप लगाते समय यह बिल्कुल भूल जाते हैं कि पिछले दस साल से प्रधानमंत्री मोदी नही मनमोहन जी हैं- लेकिन अगर दोषी आदमी पर ही दोष  मढ दिया तो सीरियल मे रोचकता  कहाँ से आयेगी- उसके लिये तो यही करना पड़ेगा कि मोदी और भाजपा को इस तरह दिन रात लताड़ो मानो देश मे पिछले दस सालों से मनमोहन की अगुयायी मे कांग्रेस की नही, मोदी की अगुयायी मे भाजपा की सरकार चल रही हो ! जनलोकपाल बिल नही बना तो वह भी मोदी और भाजपा की वजह से नही बना और दिल्ली मे गैरक़ानूनी "जनलोकपाल" उपराज्यपाल ने पास नही होने दिया तो वह भी मोदी और भाजपा की वजह से.


दरअसल मोदी और भाजपा हैं ही इतने शक्तिशाली कि सब लोगों के सारे काम मोदी और भाजपा की वज़ह से रुक जाते हैं- लोग तो राजनीति मे जनसेवा की भावना से आये है और इन बेचारे लल्लू,नीतीश,ममता, माया ,मुलायम,केजरीवाल और मनमोहन जैसे जनसेवकों को मोदी और भाजपा कोई काम ही नही करने देते-अगर मोदी और भाजपा नही होते तो इन सब जनसेवकों ने पिछले 66 सालों मे इस देश को स्वर्ग से भी सुन्दर बना दिया होता,इसमे कोई शक नही है.

"मीठा हप हप, कड़वा थू थू" की तर्ज़ पर, जनसेवकों की यह अनोखी टोली यह साबित करने की भरसक कोशिश कर रही है कि इस देश मे जहां कहीं भी कुछ गलत हो गया तो उसके लिये मोदी और भाजपा जिम्मेदार है, और जो कुछ अच्छा हुआ उसका पूरा श्रेय जनसेवकों की इस अदभुत टोली को जाता है.
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rajeevg@hotmail.com
Published on 17/2/2014

चंदा वसूलने के लिये किये जा रहे हैं अंबानी पर हमले ?

मुकेश अंबानी ने देश को लूट लिया-अनिल अंबानी ने भी देश को लूट लिया ! अब हम लुटे पिटे मरे कुचले लोग जाएं तो जाएं कहाँ ? यह लोग सभी राजनीतिक दलों को दिल खोलकर चंदा देते हैं क्योंकि इस चंदे से सभी राजनीतिक दल अपना चुनाव प्रचार करते हैं-लेकिन यह लुटेरे इतने अजीब है कि अभी तक इन लोगों ने राजनीति मे हमारी उपस्थिति का संज्ञान ही नही लिया ! अगर बाकी के राजनीतिक दल राजनीति कर रहे हैं तो हम राजनीति मे क्या जनसेवा करने के लिये आये है
जो चंदा बाकी के राजनीतिक दलों को मिलता है-एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल होने के नाते उस चंदे पर हमारा भी तो उतना ही हक है- देखा जाये तो हमारा हक कुछ ज्यादा ही है क्योंकि हम राजनीति मे नये नये आये हैं और हमारी जरूरतें भी कुछ ज्यादा ही है क्योंकि चुनाव प्रचार के अलावा हमे एक और भारी खर्चे का सामना भी करना पड सकता है

दरअसल हम लोगों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिये लोगों पर भ्रष्टाचार के अनाप शनाप मनगढ़ंत और झूठे आरोप लगा तो दिये है-सब लोगों के पास तो मानहानि का दावा ठोंकने के लिये समय नही है लेकिन अगर कुछ लोगों ने भी हमारे ऊपर मानहानि का दावा ठोंक दिया तो हमारी बची खुची साख तो मिट्टी मे मिलेगी ही, हमारी अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह चरमरा सकती है-लिहाज़ा चंदे की हमे बहुत सख्त और जल्द आवश्यकता है-अगर हमारी इस जायज़ मांग का अभी भी देश के बड़े बड़े व्यापारियों और उद्योगपतियों ने संज्ञान नही लिया तो हम लोगों को विवश होकर उन लोगों के लिये " चोर लुटेरे " के अलावा अन्य  भडकाऊ शब्दावली तलाशनी होगी !

दरअसल यह बड़े बड़े उद्योगपति इतने अधिक ढीठ हैं कि हमारी लाख कोशिशों के बाबजूद हमारे चंगुल मे फंसने को तैयार नही है- हम लोग इस बात को अपनी सबसे बड़ी अवमानना मानते हैं कि देश के इतने बड़े बड़े व्यापारी हमे कुछ समझ ही नही रहे और हमे कुछ   भाव ही नही दे रहे ! इन व्यापारियों और उद्योगपतियों द्वारा लगातार की जा रही हमारी उपेक्षा से परेशान होकर हमारे एक बड़े नेता और प्रवक्ता ने तो खुले तौर पर कह भी दिया की भई हमे चंदा बंदा लेने मे कोई ऐतराज़ नही है- आओ और हमे चंदा दो और बदले मे हमसे अभयदान और ईमानदारी का अकाट्य प्रमाण पत्र भी लेकर जाओ !

हम लोगों ने अपना मुख्य राजनीतिक विरोधी मोदी को माना हुआ है और उस लिहाज़ से हमारा स्टॅंडर्ड काफी ऊँचा करके देखा जाना चाहिये और हमारे चंदे का रेट भी उसी अनुसार तय होना चाहिये !

हमारी तरफ से इसे अंतिम चेतावनी के रूप मे देखा जाना चाहिये क्योंकि अगर अभी भी इन ढीठ व्यापारियों और उद्योगपतियों के ख़ज़ाने हमारे लिये नही खुले तो इन लोगों का हम जीना दूभर कर देंगे !
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rajeevg@hotmail.com

 Published on 19/2/2014

इस तरह बनेंगे केजरीवाल पी एम !

अन्ना हज़ारे यकायक भारत की राजनीति मे पूरी तरह से सक्रिय होकर कूद पड़े है और राजनीति मे एक एक कर करके जितने भी खोटे सिक्के हैं, उनको आज़माकर उन पर अपना दाव खेलने के चक्कर मे हैं !

इस सारी कवायद मे यह भी सॉफ हो गया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ किये गये अपने तथाकथित आन्दोलन से उन्होने जनता की जितनी भी सहानुभूति और सम्मान पाया था, उसकी भी उन्होने लगभग बलि चढ़ाने का फैसला कर लिया है !

आजकल अन्ना हज़ारे महाराज पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी की वकालत करते घूम रहे हैं ! पश्चिम बंगाल मे सरकार किस तरह चल रही है यह सभी को    मालूम है- पश्चिम बंगाल के जंगल राज को देखकर लल्लू द्वारा किसी जमाने बिहार मे फैलाये गये गुन्डाराज और जंगल राज की याद ताज़ा हो जाती है- शायद पश्चिम बंगाल के कुशासन की सही तुलना उत्तर प्रदेश मे बसपा और सपा के गुन्डाराज और जंगल राज से ही की जा सकती है-ऐसे मे सवाल यह पैदा होता है कि अपने पुराने चेले केजरीवाल तो अराजकता मे धकेलने के बाद क्या अन्ना हज़ारे अब ऐसे नेताओ के समर्थन का बीड़ा उठाने चले है, जो अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता पूरी तरह खो चुके हैं ? 

लल्लू जिस जंगल राज को बिहार मे छोड़ गये थे, नीतीश ने पूरी मुस्तैदी के साथ उसे जारी रखा है- बीच मे भाजपा के साथ गठबंधन के समय कुछ हालात सुधरे, लेकिन नीतीश जंगल राज से अपने मोह  को ज्यादा समय अलग रख नही पाये और भाजपा ने उनसे नमस्ते करने मे ही अपनी भलाई समझी ! अब अगर अन्ना इन्ही राज्यों के ऐसे खोटे सिक्कों को पी एम बनाने के सपने देख रहे है तो इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा !

हो सकता है अन्ना हज़ारे यह सोच रहे हों कि पूरी तरह से मरणासन्न पड़े थर्ड फ्रंट मे वह ज़ान डालकर ममता,माया,नीतीश या मुलायम मे से किसी को अगली सरकार का मुखिया बना सकें  या फिर कोई ऐसा तुक्का फिट हो जाये कि ना ना करते हुये दिल्ली की तर्ज़ पर केजरीवाल जी ही पीं एम बन जाएं! अन्ना हज़ारे क्योंकि राजनीति मे केजरीवाल की तरह नये नये आये है और जो भी नये खिलाडी इस मैदान मे आये हैं उन्हे यह पूरा अधिकार मिल जाता है कि वह दिन के उजाले मे जागते हुये प्रधान मंत्री बनने और बनाने के सपने देख देख कर प्रफुल्लित होते रहें. 

अन्ना हज़ारे की इस नयी कवायद से यह बात भी सॉफ हो गयी है कि केन्द्र द्वारा लोकपाल बिल पास करने के बाद अब भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नही रहा-अब आज की तारीख मे सबसे बड़ा मुद्दा यही है की किस तरह से देश मे किसी ऐसे दल या गठबंधन की सरकार बनवाकर ऐसे व्यक्ति को जनता के सर पर बिठा दिया जाये जिसे इस देश की जनता ने जनादेश ही नही दिया हो-अगर ऐसा हुआ तो पहली बार नही होगा ! ऐसी अराजक स्थिति हम पहले भी देख चुके है जब चंद्रशेखर और देव गौड़ा को जबरन इस देश की जनता के ऊपर प्रधानमंत्री के तौर पर थोप दिया गया था ! चंद्रशेखर और देव गौड़ा को प्रधानमंत्री बनाने मे कांग्रेस ने जितनी भूमिका तब निभाई थी,उतनी उम्मीद लेकर तो अन्ना चल ही रहे होंगे ! देश की राजनीति मे पूरी तरह से नकार दिये गये वामपंथियों को भी अगर पूरे देश मे एक आध सीट मिल जाये, तो वे भी ऐसी अवांछित सरकार बनाने की कवायद मे अपना सहयोग देने का नाटक जारी रख सकते हैं.

मोदी से घबराये और बौखलाये हुये ये लोग सिर्फ इस डर से केजरीवाल को प्रधानमंत्री के रूप मे स्वीकार कर लेंगे कि कम से कम अब इन लोगों को अपने किये गये दुष्कर्मों का दंड तो नही मिलेगा क्योंकि केजरीवाल जी का पिछला रिकार्ड इस मामले मे बिल्कुल सॉफ है और उन्होने दिल्ली के मुख्यमंत्री रहते हुये शीला दीक्षित पर आँच तक नही आने दी थी ! इसी मनोविज्ञान और रंणनीति पर बहरूपियों यह चौकड़ी अब इकट्ठा होनी शुरु हो गयी है.

इस सारी अराजक कोशिश मे सिर्फ संतोष इस बात से किया जा सकता है कि अब इन लोगों की मक्कारियाँ जनता के सामने खुल चुकी हैं और देश को खंडित जनादेश की तरफ धकेलने की नापाक साज़िश  का जबाब जनता ऐसे लोगों की चुनावों मे जमानत जब्त कराकर देगी !
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Published on 22/2/2014

"मोदी का रास्ता रोको" अभियान !

भ्रष्ट कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली मे 49 दिनों तक गठबंधन सरकार चलाने मे पूरी तरह से नाकाम होने के बाद   केजरीवाल जी आजकल मीडिया पर बुरी तरह बरस रहे है ! जिस मीडिया ने उन्हे एक सड़कछाप आन्दोलनकारी से उठाकर मुख्य मंत्री की कुर्सी तक पहुँचाया, वही मीडिया आज उन्हे बिका हुआ लगने लगा है ! उनकी इस अपराधिक सोच का समर्थन उनके आका यानि कि हमारे गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे भी करते नज़र आ रहे है जो मीडिया को धमकाते हुये उसकी आई बी से जांच कराकर उसे कुचलने की बात कहते है !

दरअसल 1975 मे एमर्जेन्सी की आग मे देश को झोंकने वाली कांग्रेस अपनी बौखलाहट के जुनून मे किसी भी हद तक जा सकती है ! अपने राजनीतिक विरोधियों को नीचा दिखाने के लिये कांग्रेस कुछ भी कर सकती है यह तो शिन्दे के बयान से साफ हो ही चुका है- पहले भी कांग्रेस के इशारे पर एक तथाकथित पत्रिका "तहलका" के संपादक तरुण तेजपाल के जरिये  भाजपा पर हमला साधने की नाकाम कोशिस की गयी थी ! तरुण तेजपाल महोदय कांग्रेस पार्टी के इशारों पर नाच नाचकर लगातार दुष्कर्म करते रहे और अपने सभी दुष्कर्मों को उन्होने "तहलका" का नाम दे दिया ! अपने आखिरी दुष्कर्म मे तेजपाल महाराज रंगे हाथों पकड़े गये और फिलहाल गोआ की जेल मे चक्की पीस रहे हैं.

भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुये उसे रोकने के लिये पहले कांग्रेस ने तेजपाल का इस्तेमाल किया और जब जब कांग्रेस को लगा कि उसका अंतिम समय निकट आ गया है और मोदी और भाजपा की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है तो यह पार्टी केजरीवाल महाराज को लेकर मैदान मे आ गयी- यह बात किसी को मालूम भी नही पड़ती लेकिन दिल्ली मे सरकार बनाते समय इनकी पोल खुल कर सामने आ गयी ! कांग्रेस ने बड़ी शान से अपनी गठबंधन सरकार बनाकर दिल्ली मे 49 दिन तक मौज ली और जब लगा कि केजरीवाल महाराज अगर दिल्ली मे ही फंसे रहे तो बाकी देश मे मोदी की लहर को कैसे रोक पायेंगे ! लिहाज़ा किसी  ना किसी बहाने से दिल्ली की नौटंकी का पटाक्षेप करके केजरीवाल जी का रास्ता साफ कर दिया -" जाओ जहां तक जा सकते हो और मोदी और भाजपा का रास्ता रोको !"


कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री मणि शंकर सी एन एन आइ बी एन को दिये गये एक इंटरव्यू मे यह बात खुद ही कबूल चुके है कि उन्हे उम्मीद है कि मोदी का रास्ता रोकने मे आम आदमी पार्टी देश भर मे दिल्ली की तर्ज़ पर कामयाब रहेगी ! लेकिन उनकी तरफ से अगर यह कबूल नामा नही भी आता तो यह बात तो जग जाहिर ही है कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी, दोनो का एक ही मकसद है और इस मकसद को हासिल करने के लिये दोनो ही पार्टियाँ एक दूसरे का भरपूर सहयोग कर रही हैं.


जो लोग आज केजरीवाल के समर्थक हैं,कमोबेश यही लोग तेजपाल के भी समर्थक थे और उसके हर जायज़ नाज़ायज़ खुलासे पर तालियाँ पीटा करते थे ! यह बाद मे मालूम पड़ा कि तेजपाल खुलासे कम "नौटंकी" ज्यादा कर रहा था और जब उसका अपना खुलासा हुआ तो सबसे पहले उसके मुंह से यही आवाज़ आई-"यह सब भाजपा की साज़िश है !" यानि कि मोदी या भाजपा ने उससे कहा था कि तेजपाल जी जाओ और अपनी महिला सहकर्मी के साथ दुष्कर्म करो ! केजरीवाल जी भी कांग्रेस का सारा विरोध भूलकर आजकल सिर्फ भाजपा और मोदी को निशाने पर लिये हुये है- बाकी के राजनीतिक दलों की आलोचना भी केजरीवाल जी इसलिये नही करते क्योंकि वह सभी राजनीतिक दल संख्याबल पूरा ना होने पर कांग्रेस सरकार की कभी अंदर से तो कभी बाहर से मदद करते है ! कांग्रेस के खिलाफ तो केजरीवाल जी कभी कभार शर्मा शर्मी कुछ थोड़ा बहुत बोलकर अपनी औपचारिकता पूरी करने का नाटक भी बड़ी मुश्किल से कर पा रहे हैं.

केजरीवाल जी को तेजपाल बनने मे कितनी सफलता मिलेगी और कब मिलेगी और वह मोदी का कब,कितना और कैसे रास्ता रोके पायेंगे, यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा !
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Published on 26/2/2014

मोदी से 7 तीखे सवाल !

मोदी से लोग पहले भी बहुत सवाल कर चुके हैं- आजकल आम आदमी पार्टी को भी मोदी से सवाल करने का चस्का लग गया है ! ठीक भी है, अब दिल्ली का काम काज़ तो देखना नही है, वक़्त गुजारने के लिये सबके पास कुछ ना कुछ काम तो होना ही चाहिये- सो मोदी से सवाल पूछ पूछकर ही अपना वक़्त काटते रहो !

सवाल पूछने की इसलिये भी जल्दी रहती है कि पिछले 65 सालों से जुबां पर ताले पड़े हुये थे- इसलिये जो सवाल पिछले 65 सालों मे नही  पूछ पाये वह फटाफट मोदी से  पूछ लिये जाएं- कहीं ऐसा ना हो कि कल को हमारे ना चाहते हुये भी मोदी जी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ जाएं और फिर मामला उल्टा पड जाये और मोदी जी हम लोगों से ही सवाल पूछने शुरु कर दे और 65 सालों मे हम लोगों ने जो भयंकर दुष्कर्म किये है, उनका हिसाब किताब ना चाहते हुये भी देना पड जाये !
क्योंकि सवाल पूछने का मौसम चल रहा है इसलिये हमने सोचा कि हम भी एक दो सवाल मोदी जी से कर ही डालें ! हमारे मोदी जी से यह सवाल हैं :

1. प्रधानमंत्री बनने के बाद उन लोगों के लिये किस प्रकार के दंड का प्रावधान किया जायेगा जो लोग "देशद्रोह" नामक वस्तु को "सेकुलरिज्म" कहकर पिछले 65 सालों से अपनी दुकानदारी चला रहे हैं ?

2. ऐसे तथाकथित राजनीतिक दलों के खिलाफ कौन सा कानून बनाया जायेगा जो ज्यादातर समय चुनावों मे एक दूसरे के विरोधी होने की नौटंकी कर करके जनता को बेबकूफ बनाते रहते है और चुनावों से ठीक पहले इकट्ठा होकर उस अनैतिक जमावड़े को कभी "थर्ड फ्रंट" या फिर कभी "तीसरे मोर्चे" का नाम देकर जनता को एक बार फिर से बरगलाने की नाकाम कोशिश करते हैं ?

3. ऐसे तथाकथित राजनेताओं को कितने समय मे फांसी की सज़ा दी जायेगी जो  जब देखो आतंकवादियों, देशद्रोहियों और अलगाववादियों की वकालत करते रहते हैं ?

4. ऐसे लोगों के रामलीला मैदान मे कितने कोड़े लगाये जायेंगे जो जनता से "भ्रष्टाचार मुक्त " शासन का वादा करते है, और सत्ता को पाने के लिये खुद "भ्रष्टाचार युक्त" शासन मे लिप्त हो जाते हैं ?

5. ऐसे लोगों का क्या हश्र किया जायेगा जो कश्मीर को जनमत संग्रह के आधार पर पाकिस्तान को सौंपने की वकालत करते हैं ?

6. ऐसे लोगों को कितने साल की सज़ा सुनाई जायेगी जो कांग्रेस के भ्रष्टाचार  और जबरदस्त निकम्मेपन से लोगों का ध्यान बँटाने के लिये रोज रोज तरह तरह की "नौटंकी" करके जनता  और मीडिया का ध्यान अपनी तरफ खींचकर रखते है ताकि लोग 65 साल मे किये गये दुष्कर्मों को पूरी तरह भूल जाएं और इनकी प्रायोजित नौटंकी देख देखकर तालियाँ पीटते रहें ?

7. आपके प्रधान मंत्री बनने के बाद जो "सेक्युलर " लोग इस देश को छोड़ना चाहें, उन्हे देश छोड़ने की इज़ाज़त कितने दिनो मे दे जायेगी ताकि वे लोग दूसरे देशों मे जाकर अपना प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने का सपना साकार कर सकें ?

ऐसी उम्मीद की जाती है कि अगर मोदी जी ने इन 7 सवालों के जबाब दे दिये तो उनसे बाकी के लोग सवाल पूछना अपने आप ही बंद कर देंगे !
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rajeevg@hotmail.com

Published on 28/2/2014

किन मुददों पर लड़े जायेंगे 2014 के चुनाव ?

आम आदमी पार्टी के समर्थकों को इस बात से कुछ निराशा हो सकती है और कांग्रेस के समर्थकों को इस बात से कुछ राहत मिल सकती है कि पहले की तरह ही 2014 के लोकसभा चुनावों मे भी भ्रष्टाचार कोई बहुत बड़ा मुद्दा नही बन सकेगा ! इस आकलन के पीछे मुख्य कारण यही है कि भ्रष्टाचार एक राजनीतिक समस्या नही है जैसा कि इसे प्रचारित किया जा रहा है, बल्कि यह एक सामाजिक समस्या है और जिस देश मे संतरी से लेकर मंत्री तक सभी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हों, वहां सिर्फ यह मान लेना कि सिर्फ हमारे राजनेता ही भ्रष्ट है,बिल्कुल गलत होगा !

हम लोग वही नेता चुनकर संसद या विधान सभा मे भेजते है, जो हमे पसंद होते है और हम उन्ही को चुनकर भेजते है जो हमारी विचारधारा से मेल खाते है ! पिछले 65 सालों के शासन मे भी अगर हम देखें कि जब जब किसी राजनीतिक दल ने भ्रष्टाचार से लड़ने की कोशिश की, उसे वहा की जनता ने चुनावी शिकस्त देकर भ्रष्ट या फिर ज्यादा भ्रष्ट लोगों के हाथ मे सत्ता सौंप दी ! कर्नाटक, उत्तराखंड और हिमाचल मे विधान सभा चुनावों मे हुई भाजपा की हार को इसी संदर्भ मे लेकर देखा जाना चाहिये ! कर्नाटक मे भाजपा ने भ्रष्ट येदुरप्पा पर तुरंत कार्यवाही करते हुये उसे जेल का रास्ता दिखाया तो वहा की जनता ने भाजपा को दंडित करने मे जरा भी देरी नही लगाई और भाजपा को वहा की सत्ता से फटाफट बेदखल कर दिया !

यही हाल उत्तराखंड मे हुआ-उत्तराखंड ऐसा पहला राज्य था जहां के लोकपाल कानून की ना सिर्फ अन्ना हज़ारे ने बल्कि केजरीवाल ने भी तारीफ की थी, लेकिन इससे पहले कि वहा पर उस कानून पर अमल हो और कुछ लोग जेल मे चक्की पीसें, वहा भी चुनावों मे जनता ने भाजपा को सत्ता से बेदखल करके दंडित किया और उसके बाद जब कांग्रेस की सरकार विजय बहुगुणा जी ने बनाई तो सबसे पहला काम उन्होने यही किया की उस सख्त लोकपाल कानून को रद्द करके अपने मन माफिक लोकपाल कानून बनाया !

हिमाचल की कहानी भी कमोबेश कुछ इसी तरह की है जहां भ्रष्टाचार मे लिपटे वीरभद्र सिंह के नेत्रत्व मे कांग्रेस सत्ता मे आने मे कामयाब रही और भाजपा को बहा भी जनता ने कम भ्रष्ट होने के लिये दंडित किया ! इसके विपरीत जो राजनीतिक दल भरपूर मात्रा मे भ्रष्टाचार कर रहे है उनकी सरकारें पूरी तरह से सुरक्षित रहती है- शायद यही कारण है कि जिस पूर्ण बहुमत के लिये भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियाँ उत्तर प्रदेश मे तरसते रहते है, वह सपा और बसपा जैसी पार्टियों को बड़ी आसानी से सुलभ हो जाता है क्योंकि यह लोग जियो और जीने दो के सिद्धांत पर चल रहे है ! कांग्रेस ने काफी अधिक समय तक इस देश पर अगर शासन किया है तो उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि यह लोग जमकर भ्रष्टाचार करने मे पारंगत है ! जिसको सत्ता मे टिकना है उसे समय की धारा के साथ ही बहना होगा-जब तक भाजपा वाले भी केजरीवाल की तरह ईमानदार रहे उनकी भी लोकसभा मे 2 सीटे हुआ करती थी!

राजनीतिक दलों को ईमानदार रहना है या नही, यह दिशा निर्देश तो आखिर जनता जनार्दन के दरबार से ही आना होता है और लोग राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों को वेवजह दिन रात कोसते रहते हैं !शायद यही वजह है कि सुशासन और विकास ही इस बार के चुनावों मे असली मुद्दा बनकर उभरेगा और सभी राजनीतिक दल इन्ही दोनो मुद्दों पर अपना ध्यान केन्द्रित किये हुये हैं ! दिल्ली मे 49 दिनो तक अपनी सरकार चला चुके केजरीवाल जी ने भी अंतत: स्वीकार कर ही लिया कि "साम्प्रदायिकता" भ्रष्टाचार से भी बड़ा मुद्दा है, लिहाज़ा वह अब उसे दूर करने पर ही ज्यादा ध्यान देंगे !
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 Published on 3/3/2014

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